Sunday, 21 February 2016

भारत क्या है?

यह भारत क्या है? कौन है ये?क्या यही विध्वंसक सोच है ये?
हिंसा की भाषा, हिंसक कृत्य
ये कैसी सोच, यह कैसा दृश्य
भारत के बच्चों को देते कष्ट
फिर कहो 'भारत की जय' स्पष्ट
भारत की परिभाषा किसने सिखलाई
टैगोर की कही बात याद है आई
यह देश केवल धरा नहीं, इसके जन हैं
धरा शरीर मात्र है, 'आत्मा' इसके जन हैं
जनता से सम्पूर्ण है होता ये जनतंत्र
भारत की प्रगति का यही एक मंत्र
भारत की परिभाषा देखो ये 'दिनकर' का है
'नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है '
जनतंत्र समृद्ध है होता 'विमर्श विचारी' से
यह बनता है यहां के लोगों से, नर नारी से
यह देश संकीर्ण सोच का प्रतीक नहीं
देश नहीं सम्पूर्ण गर 'विचार' निर्भीक नहीं

Saturday, 22 November 2014

अरसा हुआ अलफ़ाज़ से कुछ गुफ्तगू करे 
मुद्दत हुयी है हर्फ़ की सोहबत लिए हुए 

Thursday, 30 May 2013

इन मासूम सी आँखों में कुछ ख्वाब दो

इन मासूम सी आँखों में कुछ ख्वाब दो
बढ़ते हुए बच्चों के हाथों में किताब दो

उन ख़्वाबों में चलो कुछ रंग भर दें
सूखने से पहले उन पौधों में आब दो

बंजर हो जायेंगे वो सुनहरे खेत चलो
इस जमीन को झेलम और चिनाब दो

टूटते तारों में छुपा है एक नया सूरज
चलो अँधेरे जहां को एक आफताब दो

चेहरे के नूर से चमकती हैं आँखे मेरी
गेसुओं से अपने चेहरे को हिजाब दो

जरा नकाब हटाओ रुखसार से अपने
जहाँ को एक और तुम माहताब दो

मेरी आँखों में अभी भी दम है बाकी
मेरे प्याले में साकी थोड़ी शराब दो

जिससे मिलो 'चन्दन' प्यार से मिलो
दुनिया को मुहब्बत तुम बेहिसाब दो

Tuesday, 28 May 2013

नींद से प्रेम



प्रिय हो तुम, प्रियतम हो मेरी
तुम स्वप्नों का आधार प्रिये

तुझसे मिलने के बाद प्रिये मैं
सुख दुःख अपना भूल चूका
तेरी इस कोमल छाया में मैं
दुर्गुण अपने भूल चूका
तुझसे मिलने की बेला में मैं 
भूला जग का खेल प्रिये 
प्रिय हो तुम, प्रियतम हो मेरी
तुम स्वप्नों का आधार प्रिये

जग लाख सताए ताने दे
तुम तनिक रोष न दिखाती हो 
हो कैसी कठिन  भी बेला पर
तुम अपने पास बुलाती हो
स्नेह तुम्हारा न होता कम
चाहे दिन हो या रात प्रिये 
प्रिय हो तुम, प्रियतम हो मेरी
तुम स्वप्नों का आधार प्रिये

जो दुनिया मैं न देख सका 
तेरी संगत उसे दिखाती है 
कोई वैद हकीम करेगा क्या 
जब कभी तू बैर दिखाती है 
किसी और में होगी बात कहाँ 
जो तुझमे हैं मेरी बात प्रिये 
प्रिय हो तुम, प्रियतम हो मेरी
तुम स्वप्नों का आधार प्रिये
तुम 'नींद' ही मेरी प्रियतम हो 
तुझसे ही अपना प्रेम प्रिये 

Monday, 27 May 2013

कुछ कहने को अश'आर मिलते नहीं हैं

ख्यालों के बादल आये उमड़ के
कलम मेरी क्यूँ चलने पाती नहीं है

बरसने का आलम तो लगता बहुत है 
मगर क्यूँ ये बारिश फिर होती नहीं है

कहना बहुत है, कह पाता नहीं हूँ
है काली घटा पे बरस पाती नहीं है 

जुबां जैसे मेरी थम सी गयी हो
कुछ कहने को अश'आर मिलते नहीं हैं 

Khayaalo ke baadal aaye umad ke
Kalam meri kyun chalne paati nahi hai

Barasne ka aalam to lagtaa bahut hai
Magar kyun ye baarish fir hoti nahin hai

Kahnaa bahut hai kah paata nahi hoon
Hai kaali ghataa pe baras paati nahin hai

Zubaan jaise meri tham si gayee ho
Kuchh kahne ko asha'ar milte nahin hai 

Wednesday, 19 December 2012

जन्मदिन और टॉफियां




जन्मदिन, जब बच्चा बनने की चाहत
एक बार फिर उमड़ आती है दिल में
और कुछ बचपन की सोंधी खुशबू भर आती है
केक नहीं होता था, ना चोकोलेट ही होता था
बर्फियाँ होती थी गाँव के हलवाई की दूकान की
और टॉफियां काका की छोटी परचून की दूकान से
उन टॉफियों का अपना अलग मज़ा होता था
आज उन्ही यादों की खुशबू कों ताज़ा करने की कवायद लिए
कुछ टॉफियां लाया हूँ और साथ हैं बचपन की मीठी यादें

Thursday, 22 November 2012

चंद शेर आपकी नज्र

न हुआ इश्क न सही, कोई महबूब भी मिला नहीं 
चलो कम से कम शब्-ए-हिजरा सा तो कोई गिला नहीं

लाख मिन्नतें कर लो ख़ुदा से, न वो सुनता है न सुनेगा तेरी
दो कदम बढ़ के हाथ थामो तो, उससे बढ़ कर दुआ नहीं होती.

जुबां खामोश रहे और कुछ कहने की ज़ुरूरत भी न हो
कुछ ऐसा हो कि कोई तमन्ना, कोई मसर्रत भी न हो

ख़्वाबों को भी रातों में दस्तक देने का बहाना न मिले 
और इस जहां में किसी और को पाने की चाहत भी न हो 

जुबां-ए-ख़ास को कुछ कहने की ज़ुरूरत कहाँ होती है 
तमन्नाएं व मसर्रतें भी इंसानियत की ही जुबां होती हैं

क़ातिल ने क़त्ल करके पूछा यूँ हाल-ए-दिल 
जो जान रह गयी थी, वो उसको भी ले गया

हाय ये शर्म-ओ-हया और ये गुस्ताख नज़र 
मेरे क़ातिल ने कुछ ऐसे ही हथियार छुपा रखे हैं

कहीं दैर-ओ-हरम तो कहीं बंदगी पे सवाल 
ख़ुदा परस्तों ने ये अजब बवाल बना रखे हैं 

सुर्ख गालों पर वो हंसी की चमक
आपने आँखों में क्या राज़ छुपा रखे हैं