Friday, 14 April 2017

यादों की नॉवेल

बड़ी अजीब होती हैं पुरानी यादें, सामने आती हैं ऐसे
कि जैसे गुमी हुयी किताब के सफ्हे पलट रहा हो कोई
और जानी पहचानी कहानियों का, किरदारों का हुजूम
आँखों के सामने से गुज़रता चला जाता है
और ये दिल एक बचकानी सी ख्वाहिश में जिए जाता है
एक बार फिर से उसी पल में समा जाऊं मैं
और एक किरदार उस कहानी का हो जाऊं मैं
मगर ये वक़्त का दस्तूर है और हकीकत की ज़मीन
के बस उन यादों को समेट कर चलने के सिवा
और कोई चारा नहीं वक़्त के बढ़ने के सिवा
बस उसी याद की नॉवेल को करीने से सजाते रहना
और उन्ही किरदारों संग जीस्त बिताते रहना

Monday, 14 November 2016

ये फनकार लफ़्ज़ों के

जयपुर साहित्य उत्सव की रिकॉर्डिंग में जावेद अख्तर और गुलज़ार साहब को सुन रहा था और उनकी कविताओं की विशाल समंदर में डूबे जा रहा था और ये ख़याल ज़हन में आ गया. पेश है उन सभी लफ़्ज़ों के फनकारों की शान में

कौन  हैं ये फनकार लफ़्ज़ों के
साधारण सी बात को असाधारण ढंग से कह जाने का हुनर

जैसे  साधारण दिखने वाले पत्थर पर नकाशी कर एक बेजोड मूर्ती बना दी हो
जैसे एक गोताखोर समंदर की अनजानी गहराइयों से मोती चुनके ले आया हो
जैसे पल में शब्दों  को धागे में पिरो कर एक सुनहरा हार बना दें
की जैसे जादूगर का रचा मायाजाल जिससे निकलने का दिल न करे
ये कौन हैं? ये हुनर कहाँ से आया?
सुने तो इनको ऐसा लगता है
जैसे खानसामा इक पांच सितारा होटल का
तरह तरह के बेजोड मसाले डाल के उसमे
एक नई डिश बना के पेश कर रहा हो
या की जैसे हसीं नज़ारे से पर्दा उठ रहा हो हौले हौले
सुन के इनको ऐसा है लगता
इतना नयापन इस कहानी में आया कहाँ से
फिर सोचता हूँ ये तो फनकार हैं लफ़्ज़ों के
ये जब बोलते हैं तो मिस्री घोलते हैं
हमारा तो काम है उस मिठास का आनंद लेना

मुझे है इल्म तेरी बेरुखी से क्या होगा

तुम वो मुराद हो जिसकी ख्वाहिश तो नहीं की थी पर ज़ुरूरत बहुत थी और बिन मांगे अता कर दी गयी हो.

मुझे है इल्म तेरी बेरुखी से क्या होगा
दिया है दिल तो तेरी बंदगी से क्या होगा

गए जो रूठ के, हुए जो मुझसे खफा
मेरे सनम तो मेरी ज़िन्दगी से क्या होगा

तेरी चाहत मेरी ज़िन्दगी की मंजिल है
नहीं हो तू तो इस रहगुज़र का क्या होगा

आशिकी चीज ही ऐसी है लोग कहते हैं
इश्क आँखों से नहीं हो तो इश्क क्या होगा

हाय ये शर्म-ओ-हया और ये गुस्ताख नज़र
क़त्ल करने के लिए और हथियार क्या होगा


जन्म एवं मृत्यु

जन्म एवं मृत्यु
एक आदि तो दूजा अंत
दो सिरे हैं जीवन के
और जीवन
इन दोनों बिन्दुओं के बीच डगर
हम पथिक हैं, चलते हैं, गिरते और संभलते हैं
रुक कर विश्राम कर लेना
इस डगर का नियम नहीं है
निरंतर चलना है गंतव्य की ओर
और इस राह को दिशा देना 

अमीरी - गरीबी

गरीबी भूखे रहने के हज़ारों गुर सिखाती है 
अमीरी देख कर फिर अपनी जेबें भरती जाती है 

अगरचे मुल्क की जानिब कोई देखे बद-निगाही से 
गरीबी है जो अपना सर वतन को करती जाती है 

अमीरों के घरों में घी का दिया हर रोज़ जलता है 
गरीबी एक एक लकड़ी जोड़ कर चूल्हा जलाती है 

वतन के नाम की गाते सभी हैं, और गाएंगे 
गरीबी अपनी हड्डी को बजा कर धुन बनाती है 

वतन को बेच कर वो अपना दामन भर चुकी होगी 
गरीबी अब भी क़तारों में खड़ी हो बिकती जाती है 

वो सीना ठोक कर कहते हैं कुछ दिन बीत जाने दो 
गरीबी मुस्कुरा कर एक एक दिन काटे जाती है 

अमीरी हुक्मरानों संग अपना बिस्तर बदलती है 
यां चादर बिना जग कर गरीबी रातें बिताती है 

तुम्हें क्यों दर्द होगा, तेरे घर पकवान बनते हैं 
गरीबी अपने बच्चों को भूखे ही सुलाती है 

अमीरी गिन सको तो गिन लो अपने दिन शाहजहानी के 
गरीबी आ रही है, देख वो इंक़लाब लाती है 

गरीबी और अमीरी रिश्ते में बहनें है लेकिन 
एक दिल को जलाती है और दूजी 'चन्दन' जलाती है

Saturday, 12 November 2016

Broken...

There are times when your heart is broken
Have A lot to say but nothing said
Not even a single drop off tear shed
It becomes difficult to even react
You don't know how should you act
There are times when your heart is broken

Saturday, 8 October 2016

तुझसे प्यार क्यूँ न हो

दिल मेरा ये जार जार क्यूँ न हो
टूट कर यूँ खार खार क्यूँ न हो

दिल्लगी तो कर चुके तुझसे रकीब
दिल मेरा अब तार तार क्यूँ न हो

आपकी सूरत में ही कुछ बात है
दिल का लगना बार बार क्यूँ न हो 

आपकी गुस्ताख नज़रें और वो कातिल अदा
गो आपसे फिर प्यार प्यार क्यूँ न हो

तुम ही मेरी हीर हो, लैला हो तुम
लब पे मेरे नाम तेरा बार बार क्यूँ न हो

अक्स तेरा आँख में यूँ बस चुका
अश्क में भी यार यार क्यूँ न हो

तू ही है महताब भी मोहसिन भी तू
महफिलों में ज़िक्र तेरा बार बार क्यूँ न हो

'चन्दन' की शीतलता और 'सुगंध' हो तुम
मेरी ग़ज़लों में तेरा शुमार क्यूँ न हो...