Saturday, 28 May 2011

रात बीती है मगर अब भी सहर बाकी है

रात बीती है मगर अब भी सहर बाकी है
होश में आया हूँ मगर अब भी ज़हर बाकी है

कोई नींद से जगाये मुझे सुबह हुयी
आँख तो खुल गयी है नींद अभी बाकी है

गर्म है खून मगर उसमे उबाल आता ही नहीं
इतनी वहशत है ज़माने में, कसर कुछ और अभी बाकी है?

जहाँ में रंग न जाने कितने हैं
एक अमन का रंग है जो सदियों से बाकी है

बात शम्मा की क्यूँ कर रहा परवाने तू
उसी की आग में जलना तेरा जो बाकी है

नादाँ हो जो खुश हो इश्क के अफ़साने पर
अभी है वस्ल की शब हिज्र अभी बाकी है

तेरी बुज़दिली का ज़िम्मेदार ख़ुदा कैसे है
ताज-ए-हिंद में हक माँगना अभी बाकी है

उम्र जो ढल रही तेरी तो क्या हुआ मेरे दोस्त
जोश बाजुओं में और रगों में खून अभी बाकी है

दर्द दुनिया में है बहुत ये हमने मान लिया
ये भी माना तेरी आहों में तड़प बाकी है

मैं जानता हूँ कि तू घर में खड़ा सोच रहा
अहलेवतन को क्यूँ पूछूं घर है मेरा वो बाकी है

जाने क्या सोच रहे हैं धर्म के ठेकेदार यहाँ
हिन्दू मुस्लिम में भी इंसान अभी बाकी है


16 comments:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

chandan bhai....dil ki gehraaiyon mein utartee hui rachna likhi hai aapne....kamaal kar diya...aur urdu ke shabdon ka istemaal to aafareen...aafareen....
lillah...aise hee likhte rahein..

रश्मि प्रभा... said...

गर्म है खून मगर उसमे उबाल आता ही नहीं
इतनी वेह्शत है ज़माने में, कुछ और कसर भी बाकी है?
waah

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

जाने क्या सोच रहे हैं धर्म के ठेकेदार यहाँ
हिन्दू मुस्लिम में भी इंसान अभी बाकी है

जहाँ में रंग न जाने कितने हैं
एक अमन का रंग है जो सदियों से बाकी है

सच्ची सटीक पंक्तियाँ .... प्रभावित कराती रचना ....

हरकीरत ' हीर' said...

रात बीती है मगर अब भी सहर बाकी है
होश में आया हूँ मगर अब भी ज़हर बाकी है

बहुत खूब .....

Dimps said...

Aur main na kehti thi...
tum mein likhne ki kalaa baaki hai :)

shukar hai kahaa mera maan liya...
khudah-ki-kasam tareefein aur bhi baaki hain :)

Regards,
Dimple

Vivek Jain said...

बहुत बढ़िया, लाजवाब!

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

संजय भास्कर said...

सुन्‍दर शब्‍दों के साथ भावों का बेहतरीन संयोजन ...।

नीरज गोस्वामी said...

बहुत सुन्दर शब्द और भाव पिरोये हैं आपने अपनी इस रचना में. बधाई स्वीकारें.इसे ग़ज़ल का रूप देने के लिए कुछ नियमों का पालन करना होगा. आप अच्छा लिखते हैं लिखते रहें.

नीरज

Sunil Kumar said...

जाने क्या सोच रहे हैं धर्म के ठेकेदार यहाँ
हिन्दू मुस्लिम में भी इंसान अभी बाकी है|
अपनी बात कहने का यही तरीका है बहुत अच्छे शेर है मुबारक हो

रेखा said...

मैं जानता हूँ कि तू घर में खड़ा सोच रहा
अहलेवतन को क्यूँ पूछूं घर है मेरा वो बाकी है


यही सच है.

singhSDM said...

बहुत बढ़िया ग़ज़ल है........

कोई नींद से जगाये मुझे सुबह हुयी
आँख तो खुल गयी है नींद अभी बाकी है
क्या शेर है दोस्त...... वाह वाह !!!


नादाँ हो जो खुश हो इश्क के अफ़साने पर
अभी है वस्ल की शब हिज्र अभी बाकी है
बहुत अच्छे..... जिंदाबाद !!!!

हम तो पहली बार आपके ब्लॉग पर आये....... बहुत प्रभावशाली ग़ज़ल है ये.....!!!!!

ana said...

bahut hi badhiya likha hai aapne...abhar

: केवल राम : said...

जाने क्या सोच रहे हैं धर्म के ठेकेदार यहाँ
हिन्दू मुस्लिम में भी इंसान अभी बाकी है

आज पहली बार आपके ब्लॉग तक आया हूँ ....आपकी रचनात्मकता को पढ़कर में बहुत प्रभावित हुआ ....आपकी इस ग़ज़ल का हर शेर गहरे अर्थ ध्वनित करता है ....आखिर किसकी व्याख्या करूँ और किस पर टिप्पणी करूँ .....आपका आभार ...आशा है शीघ्र ही आपकी नयी रचना पढने को मिलेगी ...!

दिगम्बर नासवा said...

चन्दन जी ... लाजवाब गज़ल है आपकी ... सुन्दर शेर ... नयी रचना लिखे काफी समय हो गया लगता है आपको ... कुछ नया जरूर लिखें ...

Khushi said...

Yunhi likhte raho yeh tammana hai meri,
Dil to chu hi liya hai,bas aasman chuna baki hai :)

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

बेहद सुन्दर गज़ल...उम्दा भाव ... बहुत खूब ..