Thursday, 30 May 2013

इन मासूम सी आँखों में कुछ ख्वाब दो

इन मासूम सी आँखों में कुछ ख्वाब दो
बढ़ते हुए बच्चों के हाथों में किताब दो

उन ख़्वाबों में चलो कुछ रंग भर दें
सूखने से पहले उन पौधों में आब दो

बंजर हो जायेंगे वो सुनहरे खेत चलो
इस जमीन को झेलम और चिनाब दो

टूटते तारों में छुपा है एक नया सूरज
चलो अँधेरे जहां को एक आफताब दो

चेहरे के नूर से चमकती हैं आँखे मेरी
गेसुओं से अपने चेहरे को हिजाब दो

जरा नकाब हटाओ रुखसार से अपने
जहाँ को एक और तुम माहताब दो

मेरी आँखों में अभी भी दम है बाकी
मेरे प्याले में साकी थोड़ी शराब दो

जिससे मिलो 'चन्दन' प्यार से मिलो
दुनिया को मुहब्बत तुम बेहिसाब दो

5 comments:

Dimple said...

Kya baat hai...!! Bahut khoob

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

जनाब आप तो वैसे ही बेहिसाब मोहब्बत बाँट रहे हैं अपनी इन कातिल रचनाओं के ज़रिये!

केवल एक ही शब्द…….आफरीन !!

दिगम्बर नासवा said...

जरा नकाब हटाओ रुखसार से अपने
जहाँ को एक और तुम माहताब दो ..

बहुत खूब .. क्या कहने ... सुभान अल्ला ... इस दुनिया को एक चाँद दे दो ... लाजवाब शेर है ...

PoeticRebellion said...

शब्द कि इस मर्म को .... मैं यूँ समझ कर आ गया …
अल्फाज पढ़ के यूँ लगा .... खुद से ही मिल के आ गया ....

बहुत खूब ....

बहुत सालों से ऐसा नहीं पढ़ा। ।

Prasanna Badan Chaturvedi said...

वाह...उत्तम...इस प्रस्तुति के लिये आप को बहुत बहुत धन्यवाद...

नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी