Monday, 14 November 2016

ये फनकार लफ़्ज़ों के

जयपुर साहित्य उत्सव की रिकॉर्डिंग में जावेद अख्तर और गुलज़ार साहब को सुन रहा था और उनकी कविताओं की विशाल समंदर में डूबे जा रहा था और ये ख़याल ज़हन में आ गया. पेश है उन सभी लफ़्ज़ों के फनकारों की शान में

कौन  हैं ये फनकार लफ़्ज़ों के
साधारण सी बात को असाधारण ढंग से कह जाने का हुनर

जैसे  साधारण दिखने वाले पत्थर पर नकाशी कर एक बेजोड मूर्ती बना दी हो
जैसे एक गोताखोर समंदर की अनजानी गहराइयों से मोती चुनके ले आया हो
जैसे पल में शब्दों  को धागे में पिरो कर एक सुनहरा हार बना दें
की जैसे जादूगर का रचा मायाजाल जिससे निकलने का दिल न करे
ये कौन हैं? ये हुनर कहाँ से आया?
सुने तो इनको ऐसा लगता है
जैसे खानसामा इक पांच सितारा होटल का
तरह तरह के बेजोड मसाले डाल के उसमे
एक नई डिश बना के पेश कर रहा हो
या की जैसे हसीं नज़ारे से पर्दा उठ रहा हो हौले हौले
सुन के इनको ऐसा है लगता
इतना नयापन इस कहानी में आया कहाँ से
फिर सोचता हूँ ये तो फनकार हैं लफ़्ज़ों के
ये जब बोलते हैं तो मिस्री घोलते हैं
हमारा तो काम है उस मिठास का आनंद लेना

1 comment:

Rajesh kumar Rai said...

वाह ! बहुत खूब !!