Monday, 21 January 2019

कुरबतों के बाद भी कुछ मस्सला सा लगता है

कुरबतों के बाद भी कुछ मस्सला सा लगता है।
पास हैं इतने मगर इक फासला सा लगता है।

 नजदीकियों के समन भी दूरियों का सिलसिला
बावफा है दोस्त फिर क्यूं बेवफा सा लगता है।

दश्त में डूबे हुए हैं, दरिया में भी प्यास है
ये जहां तो अब मुझे कुछ बुझा बुझा सा लगता है।

दिल रकीबों में भी इक अजनबी बन के बैठा है
रेहगुजर का वो अनजाना मुझे सगा सा लगता है।


Wednesday, 22 August 2018

ता-हद्द-ए-नज़र कुछ भी सुझाई नहीं देता
इंसानियत का नाम-ओ-निशाँ दिखाई नहीं देता

उस शय के लिए हो जाते हैं ख़ूं के प्यासे
जिस शय का कोई वुजूद दिखाई नहीं देता

~~ Fani Raj

उनका सलाम आया नहीं

बड़ी मुद्दत हुई उनका सलाम आया नहीं
आज यूं लगता है मुझे, वो मकाम आया नहीं

सोचते ही सोचते हो जाती है भोर
सूना दरवाज़ा कहता है कि वो आया नहीं

इंतज़ार में रकीब हालत ये मेरी हो गई
अब जो आया तो कहूंगा साथ हमसाया नहीं

इंतज़ार ए वस्ल में सोया नहीं मैं उम्र भर
नींद से जागा नहीं और नींद भर सोया नहीं

Friday, 14 April 2017

यादों की नॉवेल

बड़ी अजीब होती हैं पुरानी यादें, सामने आती हैं ऐसे
कि जैसे गुमी हुयी किताब के सफ्हे पलट रहा हो कोई
और जानी पहचानी कहानियों का, किरदारों का हुजूम
आँखों के सामने से गुज़रता चला जाता है
और ये दिल एक बचकानी सी ख्वाहिश में जिए जाता है
एक बार फिर से उसी पल में समा जाऊं मैं
और एक किरदार उस कहानी का हो जाऊं मैं
मगर ये वक़्त का दस्तूर है और हकीकत की ज़मीन
के बस उन यादों को समेट कर चलने के सिवा
और कोई चारा नहीं वक़्त के बढ़ने के सिवा
बस उसी याद की नॉवेल को करीने से सजाते रहना
और उन्ही किरदारों संग जीस्त बिताते रहना

Monday, 14 November 2016

ये फनकार लफ़्ज़ों के

जयपुर साहित्य उत्सव की रिकॉर्डिंग में जावेद अख्तर और गुलज़ार साहब को सुन रहा था और उनकी कविताओं की विशाल समंदर में डूबे जा रहा था और ये ख़याल ज़हन में आ गया. पेश है उन सभी लफ़्ज़ों के फनकारों की शान में

कौन  हैं ये फनकार लफ़्ज़ों के
साधारण सी बात को असाधारण ढंग से कह जाने का हुनर

जैसे  साधारण दिखने वाले पत्थर पर नकाशी कर एक बेजोड मूर्ती बना दी हो
जैसे एक गोताखोर समंदर की अनजानी गहराइयों से मोती चुनके ले आया हो
जैसे पल में शब्दों  को धागे में पिरो कर एक सुनहरा हार बना दें
की जैसे जादूगर का रचा मायाजाल जिससे निकलने का दिल न करे
ये कौन हैं? ये हुनर कहाँ से आया?
सुने तो इनको ऐसा लगता है
जैसे खानसामा इक पांच सितारा होटल का
तरह तरह के बेजोड मसाले डाल के उसमे
एक नई डिश बना के पेश कर रहा हो
या की जैसे हसीं नज़ारे से पर्दा उठ रहा हो हौले हौले
सुन के इनको ऐसा है लगता
इतना नयापन इस कहानी में आया कहाँ से
फिर सोचता हूँ ये तो फनकार हैं लफ़्ज़ों के
ये जब बोलते हैं तो मिस्री घोलते हैं
हमारा तो काम है उस मिठास का आनंद लेना

मुझे है इल्म तेरी बेरुखी से क्या होगा

तुम वो मुराद हो जिसकी ख्वाहिश तो नहीं की थी पर ज़ुरूरत बहुत थी और बिन मांगे अता कर दी गयी हो.

मुझे है इल्म तेरी बेरुखी से क्या होगा
दिया है दिल तो तेरी बंदगी से क्या होगा

गए जो रूठ के, हुए जो मुझसे खफा
मेरे सनम तो मेरी ज़िन्दगी से क्या होगा

तेरी चाहत मेरी ज़िन्दगी की मंजिल है
नहीं हो तू तो इस रहगुज़र का क्या होगा

आशिकी चीज ही ऐसी है लोग कहते हैं
इश्क आँखों से नहीं हो तो इश्क क्या होगा

हाय ये शर्म-ओ-हया और ये गुस्ताख नज़र
क़त्ल करने के लिए और हथियार क्या होगा


जन्म एवं मृत्यु

जन्म एवं मृत्यु
एक आदि तो दूजा अंत
दो सिरे हैं जीवन के
और जीवन
इन दोनों बिन्दुओं के बीच डगर
हम पथिक हैं, चलते हैं, गिरते और संभलते हैं
रुक कर विश्राम कर लेना
इस डगर का नियम नहीं है
निरंतर चलना है गंतव्य की ओर
और इस राह को दिशा देना